Sunday, August 11, 2013

गलती



गलती

सर्दी का समय था, जनवरी का महीना था ठण्ड इतनी कड़ाके की थी कि हाथ पैर सुन्न कर दे चाँदनी रात थी आकाश में बादल चंद्रमा को घेरे हुए थे और निर्बाध रूप से चमकने में बाधा उत्पन्न कर रहे थे चाँद का तो जैसे बादलो के साथ द्वन्द युध चल रहा था कभी चाँद बादलो पर विजय पाकर चमकता तो कभी उनकी गिरफ्त में जकड़ा जाता चाँद अभिमन्यु की भाँति बदलो के चक्रव्यूह को तोड़ने का भरकस प्रयास कर रहा था। हवा इतनी
ठंडी चल रही थी कि जिसकी ठंडक शरीर को काँटे की तरह चुभ रही थी ऐसे वातावरण में एक गन्दी तथा मैली कमीज पहले एक लड़का बैठा हुआ था   उसकी कमीज कई स्थानों से फटी हुयी थी जिससे प्रवेश कर हवा ठण्ड की अनुभूति दे रही थी पर उसका ध्यान इस और नहीं था वह अपने अतीत की यादों में सफ़र कर रहा था वह सोच रहा था की कहा वह फैजाबाद के सबसे अमीर सेठ लक्ष्मीचंद का इकलौता बेटा था उसने गरीबी को देखा तक नहीं था उसकी प्रत्येक मांग उसके पिता द्वारा पूरी की जाती थी जिससे वह बिगड़ गया था एक दिन उसे उसकी किसी गलती के लिए डाटा गया था पर वह अपनी गलती स्वीकार करने को तैयार नहीं था और अचानक एक दिन छुब्द होकर घर से भाग आया जिसके कारण उसकी ये दशा बनी हुयी है शायद अब उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा है

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